स्वच्छता की सीख
स्वच्छता की सीख
(एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी)
विद्यालय को ज्ञान का मंदिर कहा जाता है, क्योंकि यहीं से बच्चों के सपनों को दिशा मिलती है। लेकिन ज्ञान का यह मंदिर तभी सुंदर लगता है, जब उसका वातावरण स्वच्छ, साफ और अनुशासित हो।
एक सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाली गाइड बच्चियाँ रोज़ देखती थीं कि विद्यालय के आसपास कूड़ा फैला रहता है। परिसर गंदा होने के कारण न केवल विद्यालय की सुंदरता कम हो रही थी, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य पर भी इसका असर पड़ रहा था। कई बार बच्चे बीमार पड़ जाते थे, पर किसी ने इसे गंभीरता से नहीं सोचा था।
एक दिन विद्यालय के स्काउट मास्टर एवं शिक्षक श्री सत्यनारायण कन्नौजिया जी ने इस विषय पर बैठक बुलाई। बैठक में उन्होंने बच्चियों से कहा,
“अगर हम खुद बदलाव नहीं लाएँगे, तो कोई और नहीं आएगा। स्वच्छता की शुरुआत हमें अपने विद्यालय से ही करनी होगी।”
उनकी बातों से प्रेरित होकर आठ गाइड बच्चियों ने मिलकर स्वच्छता अभियान चलाने का निश्चय किया। उन्होंने विद्यालय परिसर की सफाई की योजना बनाई और पूरे उत्साह के साथ कार्य में जुट गईं। किसी ने झाड़ू उठाई, किसी ने कूड़ा एकत्र किया, तो किसी ने आसपास के लोगों को स्वच्छता के बारे में समझाया।
बच्चियाँ लोगों से कहती थीं,
“गंदगी फैलाने से बीमारियाँ बढ़ती हैं। अगर हम आज सावधान रहेंगे, तो कल स्वस्थ रहेंगे।”
धीरे-धीरे विद्यालय का वातावरण बदलने लगा। परिसर साफ और सुंदर दिखने लगा। शिक्षक खुश थे, बच्चे गर्व महसूस कर रहे थे और आसपास के लोग भी जागरूक होने लगे। अब लोग कूड़ा इधर-उधर फेंकने से पहले सोचने लगे।
इस छोटे-से प्रयास ने सभी को एक बड़ी सीख दी—
स्वच्छता केवल एक दिन का काम नहीं, बल्कि एक आदत है।
जब बच्चे आगे बढ़कर समाज को संदेश देते हैं, तो बदलाव निश्चित होता है।
यह स्वच्छता अभियान UNICEF एवं भारत स्काउट और गाइड के संयुक्त प्रयास का एक सुंदर उदाहरण बना, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि यदि नीयत साफ हो, तो वातावरण भी साफ किया जा सकता है।
सीख
हम अपने विद्यालय, समाज और आसपास के क्षेत्र को स्वच्छ रखकर न केवल खुद को स्वस्थ बना सकते हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित कर सकते हैं।
छोटा कदम, बड़ा बदलाव।